चमोली की वो रात: पिपलकोटी सुरंग हादसे की पूरी कहानी
13 अगस्त 2026 की शाम, उत्तराखंड के चमोली जिले का पिपलकोटी इलाका किसी और शाम की तरह ही ढल रहा था। पहाड़ों की ठंडी हवा, अलकनंदा नदी की कल-कल आवाज़, और सुरंग के भीतर अपने रोज़ के काम में जुटे मज़दूर — सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन शाम करीब पौने आठ बजे, इस शांति को एक ऐसी घटना ने तोड़ दिया जिसने पूरे राज्य को फिर एक बार हिला दिया।
हादसा कैसे हुआ
यह सुरंग THDC (टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) के विष्णुगाड-पिपलकोटी जलविद्युत परियोजना का हिस्सा है — अलकनंदा नदी पर बन रहा करीब तीन किलोमीटर लंबा एक निर्माणाधीन सुरंग-तंत्र, जिसका निर्माण हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी (HCC) कर रही है।
उस शाम, बिरही नदी के पास अचानक ज़मीन धंसने जैसी स्थिति बनी। कुछ चश्मदीदों के अनुसार पहले एक तेज़ धमाके जैसी आवाज़ सुनाई दी, और उसके ठीक बाद सुरंग की छत से भारी मात्रा में मलबा और पानी बहकर अंदर घुस आया। देखते ही देखते सुरंग का एक हिस्सा पानी और कीचड़ से भर गया। उस वक़्त सुरंग के भीतर काम कर रहे कुल 22 मज़दूर इस अचानक आई आपदा में फंस गए।
अंधेरे, भरते पानी और लगातार बहते मलबे के बीच मज़दूरों के लिए बाहर निकलने का रास्ता मुश्किल होता गया। जो लोग शुरुआती चंद मिनटों में सुरंग के मुहाने की ओर भाग पाए, वे बच निकले, लेकिन बाकी अंदर ही फंसे रह गए।
रेस्क्यू ऑपरेशन: रातभर चली जद्दोजहद
खबर फैलते ही प्रशासन हरकत में आया। रातों-रात राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), जिला आपदा मोचन बल (DDRF) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) की टीमें मौके पर पहुंच गईं। पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन भी साथ में जुट गए।
रातभर चले ऑपरेशन में सुबह तक 19 मज़दूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, लेकिन सात लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी और तीन मज़दूर अब भी लापता थे। जो घायल हुए, उन्हें पिपलकोटी के अस्पताल में भर्ती कराया गया, और गंभीर हालत वालों के लिए हेली-लिफ्ट और श्रीनगर व ऋषिकेश के बड़े अस्पतालों तक पहुंचाने की व्यवस्था तैयार रखी गई।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद घायल मज़दूरों से फोन पर बात की और उनके हाल-चाल जाने। चूंकि कई मज़दूर झारखंड और छत्तीसगढ़ से थे, इसलिए धामी ने इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी स्थिति से अवगत कराया।
सुरंग के भीतर जमा पानी और कीचड़ ने रेस्क्यू टीमों के लिए काम को और कठिन बना दिया। करीब 900 मीटर का हिस्सा पूरी तरह जलमग्न हो चुका था, जिस वजह से टीमों को बारी-बारी (रोटेशन के आधार) पर मैनुअल तरीके से तलाशी लेनी पड़ रही थी।
अगले दिन एक और शव बरामद हुआ, जिससे मृतकों की संख्या आठ हो गई, और लापता मज़दूरों की संख्या घटकर दो रह गई। रेस्क्यू ऑपरेशन बिना रुके, लगातार जारी रहा।
विवाद: क्या चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया गया?
जैसे-जैसे रेस्क्यू आगे बढ़ा, इस हादसे के पीछे की वजहों पर भी सवाल उठने लगे। भूवैज्ञानिक नवीन जुयाल ने इस बात की ओर इशारा किया कि विष्णुगाड-पिपलकोटी इलाके की चट्टानें कमज़ोर मानी जाती रही हैं, और यह बात साल 2009 में तैयार हुई पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में भी दर्ज थी। उस रिपोर्ट में साफ चेतावनी दी गई थी कि इस क्षेत्र में कई झरने हैं और मैना नदी से लेकर टेल-रेस टनल तक फॉल्ट लाइनें व कमज़ोर भूभाग पहले से चिन्हित हैं, इसलिए खुदाई के दौरान विशेष सावधानी बरतनी ज़रूरी है। जुयाल के मुताबिक ज़रूरी सुरक्षा उपाय समय रहते नहीं अपनाए गए।
इस बीच उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी सरकार को घेरा। उन्होंने बताया कि घायल मज़दूरों से बात करने पर पता चला कि हादसे वाली जगह पर काफी समय से पानी का रिसाव (लीक) हो रहा था — सवाल यह है कि इस रिसाव को अनदेखा क्यों किया गया। उन्होंने मुआवज़े को भी नाकाफी बताया, यह कहते हुए कि THDC/NTPC की ओर से दी गई एक लाख रुपये की राशि पर्याप्त नहीं है।
जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंद किशोर जोशी ने भी एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा किया — उत्तराखंड में बार-बार ऐसे हादसे होते रहे हैं, चाहे 2021 का तपोवन हादसा हो या 2023 का सिल्क्यारा टनल हादसा, लेकिन हर बार सबक नहीं सीखा जाता।
इन सवालों के बीच मुख्यमंत्री धामी ने साफ किया कि निर्माण कार्यों में सुरक्षा को किसी भी कीमत पर सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, और उन्होंने पूरे मामले की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि हादसा शुद्ध रूप से प्राकृतिक भूगर्भीय कारणों से हुआ या इसमें निर्माण संबंधी लापरवाही भी शामिल थी। इसके साथ-साथ केंद्र सरकार की ओर से भी एक तकनीकी जांच कराई जाएगी।
अभी की ताज़ा स्थिति 16 August 2026
रिपोर्ट लिखे जाने तक की जानकारी के अनुसार, मृतकों की संख्या आठ है और दो मज़दूर अब भी लापता हैं। रेस्क्यू टीमें मुश्किल मौसम और सुरंग में भरे ऊंचे जलस्तर के बावजूद बिना रुके तलाशी अभियान चला रही हैं। साइट पर विरोध कर रहे मज़दूरों से राज्य के मंत्री ने मुलाकात कर सुरक्षा मानकों की जांच और उचित मुआवज़े का भरोसा दिलाया है।
एक और चेतावनी, या फिर वही पुरानी कहानी?
पिपलकोटी का यह हादसा हिमालय की नाज़ुक भूगर्भीय संरचना में हो रहे बड़े निर्माण कार्यों पर एक बार फिर सवाल खड़ा करता है। 2021 का तपोवन हादसा हो, 2023 का सिल्क्यारा टनल हादसा, या अब यह पिपलकोटी हादसा — हर बार वही सवाल दोहराया जाता है: क्या हम पहाड़ों की चेतावनियों को सुन रहे हैं, या हर हादसे के बाद सिर्फ जांच के आदेश देकर भूल जाते हैं?
जवाब आने वाले दिनों में मजिस्ट्रियल और तकनीकी जांच रिपोर्टों से मिलेगा। लेकिन तब तक, चमोली के पहाड़ों में फंसे उन दो मज़दूरों के परिवार बस एक ही दुआ कर रहे हैं — कि उनका इंतज़ार जल्द खत्म हो।
यह लेख विभिन्न समाचार स्रोतों (ANI, Down To Earth, Deccan Chronicle, The Week) से मिली जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। चूंकि रेस्क्यू ऑपरेशन और जांच अभी जारी है, आगे स्थिति में बदलाव संभव है।
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