वीरता की मिसाल: उत्तराखंड के लाल हवलदार गजेंद्र सिंह को मरणोपरांत कीर्ति चक्र

वीरता की मिसाल: उत्तराखंड के लाल हवलदार गजेंद्र सिंह को मरणोपरांत कीर्ति चक्र, साथियों की जान बचाने में दी शहादत

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया की बहादुरी को देश ने एक बार फिर सलाम किया है। 43 वर्षीय गजेंद्र सिंह को उनकी असाधारण वीरता के लिए मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित शौर्य सम्मान 'कीर्ति चक्र' से सम्मानित किया जाएगा।
कैसे हुई शहादत

सेना मुख्यालय की जानकारी के मुताबिक, 18-19 जनवरी 2026 को जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ क्षेत्र में जारी आतंकवाद विरोधी अभियान 'ऑपरेशन त्राशी' के दौरान हवलदार गजेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ कलामसोई नाला क्षेत्र में तैनात थे। इसी दौरान छिपे आतंकियों ने भारी गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें गजेंद्र सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए।
साथियों को बचाने के लिए दांव पर लगाई जान
भारी गोलाबारी के बीच भी हवलदार गजेंद्र सिंह ने अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना असाधारण साहस दिखाया। उन्होंने सबसे पहले गंभीर रूप से घायल एक साथी स्काउट को सुरक्षित निकालकर उसे तत्काल प्राथमिक उपचार दिया। इसके बाद, अपनी जान की चिंता किए बगैर वह दूसरे घायल साथी को भी बचाने आगे बढ़े, इसी कोशिश के दौरान उन्हें कई गोलियां लगीं।

दोनों साथियों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के बावजूद, अत्यधिक खून बहने की हालत में भी उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया और आतंकियों पर दोबारा हमला बोला। इस जवाबी कार्रवाई में उन्होंने एक कुख्यात और वांछित विदेशी आतंकवादी को गंभीर रूप से घायल कर दिया। कर्तव्य पथ पर अडिग रहते हुए अंततः वह वीरगति को प्राप्त हुए।
पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर शहादत की खबर मिलते ही पूरे उत्तराखंड में शोक छा गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित कई मंत्रियों और विधायकों ने शहीद के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। शहीद का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव गैनाड़, कपकोट, बागेश्वर लाया गया, जहां पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और स्थानीय लोगों ने अपने वीर सपूत को नम आंखों से अंतिम विदाई दी।
कीर्ति चक्र: शांतिकाल का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार
कीर्ति चक्र भारत का शांतिकाल में दिया जाने वाला दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है, जो असाधारण साहस और बलिदान के लिए दिया जाता है। हवलदार गजेंद्र सिंह को यह सम्मान मरणोपरांत मिलना उनके परिवार और पूरे उत्तराखंड प्रदेश के लिए गर्व की बात है, भले ही यह उनके अपनों के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
गजेंद्र सिंह गढ़िया की यह शहादत हमेशा याद दिलाती रहेगी कि सीमा पर तैनात हमारे जवान किस तरह अपनी जान की परवाह किए बिना देश और अपने साथियों की रक्षा के लिए हर पल तैयार रहते हैं। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
देश उनके इस अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को नमन करता है।

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