हरिद्वार में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर मंथन: कार्यक्रम में पहुंचे सीएम धामी, शिवराज सिंह चौहान, रामदेव और संत समाज
हरिद्वार में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर मंथन: कार्यक्रम में पहुंचे सीएम धामी, शिवराज सिंह चौहान, रामदेव और संत समाज
ज्वालापुर मार्ग स्थित श्रीजी वाटिका में संत समाज की पहल पर आयोजित संगोष्ठी में एक साथ चुनाव कराए जाने के मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम स्थल पर पुलिस बल की तैनाती के साथ चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था की गई।
हरिद्वार में रविवार को संत समाज की ओर से 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' विषय पर एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें प्रदेश और केंद्र की राजनीति के साथ-साथ धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र की कई बड़ी हस्तियां एक मंच पर नजर आईं। ज्वालापुर मार्ग स्थित श्रीजी वाटिका में हुए इस आयोजन में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद पहुंचे और चर्चा में हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और योग गुरु स्वामी रामदेव भी मौजूद रहे। इनके अलावा अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी समेत संत समाज के कई प्रमुख साधु-संत और शहर के गणमान्य नागरिक भी इस मंथन में शामिल हुए। पूरे कार्यक्रम के दौरान मंच पर देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की जरूरत, इसके संभावित फायदों और इससे जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर बिंदुवार चर्चा होती रही।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री स्तर के नेताओं की मौजूदगी को देखते हुए आयोजन स्थल पर सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए थे। भारी पुलिस बल तैनात किया गया और आसपास के इलाकों में यातायात व्यवस्था पर भी विशेष निगरानी रखी गई, ताकि आम जनजीवन प्रभावित न हो और कार्यक्रम सुचारू रूप से संपन्न हो सके।
क्यों अहम है यह मुद्दा
'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का विचार लंबे समय से केंद्र सरकार और भाजपा के एजेंडे में शामिल रहा है। इसके तहत लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ या तय समयावधि के भीतर कराने का प्रस्ताव है, जिसका मकसद बार-बार होने वाले चुनावों से पड़ने वाले प्रशासनिक और आर्थिक बोझ को कम करना बताया जाता है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी उच्च स्तरीय समिति पहले ही इस पर अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप चुकी है, और इस पर संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) में भी विचार जारी है। हरिद्वार जैसे धार्मिक-सामाजिक केंद्र में संत समाज की भागीदारी वाला यह आयोजन इस बहस को जनता के बीच और व्यापक बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
कार्यक्रम को लेकर स्थानीय स्तर पर भी खासा उत्साह देखा गया, और आयोजन स्थल के आसपास लोगों की भीड़ जुटी रही। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों में भी इसी तरह की जनजागरूकता संगोष्ठियां आयोजित किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
स्रोत: अमर उजाला की रिपोर्ट पर आधारित।
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