आज यानी 17 अगस्त, सोमवार को पूरा उत्तराखंड घी संक्रांति की रौनक में डूबा हुआ है। कुमाऊं में इसे घी त्यार कहते हैं, गढ़वाल में घी संक्रांति, और कहीं-कहीं ओलगिया भी। नाम भले अलग-अलग हों, मगर भाव एक ही है — घर-घर में घी की खुशबू, बेड़ू रोटी की गर्माहट और रिश्तों में वही पुरानी अपनापे वाली मिठास।
यह त्योहार आता ही बारिश के मौसम में क्यों है?
भादो महीने की संक्रांति के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व दरअसल फसलों के मौसम से जुड़ा है। इन्हीं दिनों धान, मंडुवा, कौणी जैसी फसलों में बालियां आनी शुरू होती हैं। पहाड़ों में लगातार बारिश की वजह से बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है, तो पुरखों ने एक सीधा-सा तरीका निकाला — घी खाओ, शरीर को ताकत दो, बीमारियों से लड़ो। असल में यह त्योहार उतना धार्मिक नहीं जितना स्वास्थ्य और खेती-किसानी का उत्सव है।
इस दिन लोग घी से माथे, घुटनों, कोहनियों की मालिश करते हैं, छोटे बच्चों के तलवों में मक्खन लगाया जाता है, और घर की रसोई में बेड़ू रोटी, गाबे की सब्जी, पत्यूड़, लापसी जैसे पकवान बनते हैं। बागेश्वर और पिथौरागढ़ जैसी जगहों पर तो गांव के आंगन में झोड़ा-चांचरी जैसे लोकनृत्य भी होते हैं, ढोल बजते हैं, लोग गोल घेरा बनाकर नाचते हैं।
अब बात उस कहानी की, जो हर पहाड़ी घर में सुनी-सुनाई जाती है
बचपन में हम सबने अपनी दादी-नानी से यह कहानी जरूर सुनी होगी। कहते हैं कि जो इंसान इस दिन घी नहीं खाता, वो अगले जन्म में "गनेल" यानी घोंघा बनकर पैदा होता है। सुनने में यह बात थोड़ी अजीब और डरावनी लगती है, लेकिन इसके पीछे की सोच बहुत गहरी है।
असल में पुराने जमाने में गांव के लोगों को यह समझाना आसान नहीं था कि घी सेहत के लिए क्यों जरूरी है। न कोई डॉक्टर था, न कोई साइंस की किताब। तो बुजुर्गों ने एक तरकीब निकाली — डर और मान्यता के सहारे लोगों को सही आदत की तरफ मोड़ना। घोंघा एक ऐसा जीव है जो धीमा होता है, हमेशा गीली-सीली, कीचड़ भरी जगहों में रेंगता रहता है — यानी अगर तुमने अपने शरीर का, अपनी सेहत का ख्याल नहीं रखा, तो अगला जन्म भी उतना ही बेजान और सुस्त होगा। यह सिर्फ डराने की बात नहीं थी, बल्कि यह सिखाने का एक तरीका था कि प्रकृति ने जो कुछ हमें दिया है — दूध, घी, मक्खन — उसकी कद्र करो।
गांव के बुजुर्ग आज भी यह कहानी उसी अंदाज़ में सुनाते हैं जैसे कोई राज़ खोल रहे हों — "देखो, आज घी जरूर खा लेना, नहीं तो अगले जन्म में घोंघा बनोगे!" और बच्चे हंसते-हंसते चम्मच भर घी मुंह में डाल लेते हैं। यही तो असली जादू है इन लोककथाओं का — डर नहीं, बल्कि प्यार से डराकर सिखाना।
ओलग की परंपरा — रिश्तों का असली त्योहार
एक और खूबसूरत परंपरा है "ओलग" देने की। पुराने समय में कुमाऊं के चंद राजाओं के दौर में किसान और कारीगर इस दिन अपने हाथ की बनी चीज़ें, घी, फल, अनाज लेकर राजा के दरबार में भेंट करने जाते थे। आज राजा-दरबार तो नहीं रहे, लेकिन यह परंपरा आज भी जिंदा है — बस अब यह भेंट रिश्तेदारों, गुरुजनों और गांव के बड़े-बुजुर्गों को दी जाती है। कोई अपने मायके से घी भेजता है, कोई अपनी बुआ-मौसी के घर मिठाई लेकर जाता है। यह त्योहार असल में बताता है कि रिश्ते सिर्फ फोन कॉल से नहीं, बल्कि एक कटोरी घी और थोड़े से अपनेपन से भी निभते हैं।
आज के दिन क्या करें
अगर आप उत्तराखंड से बाहर भी रहते हैं, तो आज बस इतना कीजिए — घर पर बनी कोई भी चीज़ थोड़े से घी के साथ खाइए, किसी बुजुर्ग को फोन लगाइए और उनसे यह कहानी दोबारा सुनिए। यकीन मानिए, उनकी आवाज़ में यह किस्सा सुनने का मज़ा ही कुछ और है। यही तो हमारे पहाड़ी त्योहारों की असली पहचान है — सादगी में छुपी हुई गहरी सीख, और मिट्टी से जुड़ी वो कहानियां जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमें अपनी जड़ों से बांधे रखती हैं।
घी संक्रांति की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं।
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